Friday, November 19, 2010

मुखौटा

दस चेहरे अपने 
कब चाहा था मैंने 
एक ही चेहरा अन्दर 
और एक ही चेहरा बाहर 
बनाये रखा बरसोँ  

बदलती जा रही हूँ 
पुराने वजूद को 
जब ग़मगीन होती 
मुस्कराहट का मुखौटा 
चढ़ा लिया
नयनो से धारा बन बहते आंसू की जगह 
सख्त, तने चेहरे लिए

साहस को समेटती   
बेबाक, उन्मुक्त बोल जाती थी जहाँ 
वहां मूक, बुत सा  चेहरा लिए  होती 

जिस सभा में अपनी 
आभा लगती मद्धिम
वहां भी दीप की तरह 
जलाये रखती खुद को 

अलग -अलग रिश्तो में 
बदलने पड़ते चेहरे 
जब कोई चेहरा नहीं होता 
तब सिर्फ खुद होते 
जीवन के इस रंगमंच के नीचे    

16 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति|

    ReplyDelete
  2. अच्छी अभिव्यक्ति , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

    ReplyDelete
  3. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

    ReplyDelete
  4. ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

    संस्‍कृत की सेवा में हमारा साथ देने के लिये आप सादर आमंत्रित हैं,
    संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर आकर हमारा मार्गदर्शन करें व अपने
    सुझाव दें, और अगर हमारा प्रयास पसंद आये तो हमारे फालोअर बनकर संस्‍कृत के
    प्रसार में अपना योगदान दें ।

    यदि आप संस्‍कृत में लिख सकते हैं तो आपको इस ब्‍लाग पर लेखन के लिये आमन्त्रित किया जा रहा है ।

    हमें ईमेल से संपर्क करें pandey.aaanand@gmail.com पर अपना नाम व पूरा परिचय)

    धन्‍यवाद

    ReplyDelete
  5. BAAS Voice का आमंत्रण :
    आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथ में सत्ता है, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी, इंसाफ आदि से दूर का भी नाता नहीं है। अधिकतर तो भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं, जो अपराधियों को संरक्षण भी देते हैं। इसका दु:खद दुष्परिणाम ये है कि ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और किसी को सजा भी नहीं होती। जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति, ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रता‹िडत एवं अपमानित किया जाता है और पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी रहती है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल, हर आम व्यक्ति को शिकार होना ही होगा। आज आम व्यक्ति की रक्षा करने वाला कोई नहीं है! ऐसे हालात में दो रास्ते हैं-या तो हम जुल्म सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय लोग एकजुट हो जायें! क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित एवं संगठित लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है। इसी पवित्र इरादे से भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) की आजीवन सदस्यता का आमंत्रण आज आपके हाथों में है। निर्णय आपको करना है!
    http://baasvoice.blogspot.com/

    ReplyDelete
  6. "बदलती जा रही हूँ
    पुराने वजूद को"

    आज के परिवेश में हमारी सोच को उजागर कराती सच्ची और बहुत अच्छी रचना

    ReplyDelete
  7. साहस को समेटती
    बेबाक, उन्मुक्त बोल जाती थी जहाँ
    वहां मूक, बुत सा चेहरा लिए होती
    गहराई की सोच को परिलक्षित करती प्रभावी अभिव्यक्ति.... अच्छी प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  8. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

    ReplyDelete
  9. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ..




    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

    ReplyDelete
  10. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी इस रचना का लिंक मंगलवार 30 -11-2010
    को दिया गया है .
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    ReplyDelete
  11. अलग -अलग रिश्तों में
    बदलने पड़ते चेहरे
    जब कोई चेहरा नहीं होता
    तब सिर्फ खुद होते
    जीवन के इस रंगमंच के नीचे
    waah

    ReplyDelete
  12. जिस सभा में अपनी
    आभा लगती मद्धिम
    वहां भी दीप की तरह
    जलाये रखती खुद को
    बहुत खूब ....शुक्रिया
    चलते -चलते पर आपका स्वागत है

    ReplyDelete
  13. अलग -अलग रिश्तों में
    बदलने पड़ते चेहरे
    जब कोई चेहरा नहीं होता
    तब सिर्फ खुद होते
    जीवन के इस रंगमंच के नीचे

    यही तो नारी जीवन है…………………सुन्दर अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  14. वहां भी जलाये रखती खुद को ...
    बेहतरीन अभिव्यक्ति !

    ReplyDelete
  15. All of us are always disturbed about the masks we wear...one sad thing about our own masks is that we start forgetting our own real face:)gr8 job.

    ReplyDelete
  16. क्या आपने ब्लॉग संकलक हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत किया है?


    अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें.
    हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

    ReplyDelete