Sunday, September 17, 2017

उम्र की ढ़लान

जब उम्र की हो ढ़लान,
तब जिंदगी नहीं होती आसान ।

जिम्मेदारियां जरूर पूरी हो जाती है तब तक,
चुनौतियां नयी-नयी देने लगती है दस्तक ।

सपनों से टूटने लगता है नाता,
हकीकत पंख फैलाने है लगता ।

सोचती हूं: सत्य, यथार्थ से दूर,
कुछ पल के लिए हो जाऊं मजबूर ।

उगते सूरज के उमंग-उत्साह में जागूं,
डूबते सूरज के साथ सुख-शांति में डूब जाऊं ।

जब जीवन रसमय होगा,
तब कविता में नवीनता प्रस्फुटित होगी ।

बादल बरसेगा, बिजली चमकेगी,
सोंधी मिट्टी की महक में हवा गुनगुनाएगी,
फूलों के रंगों की छटा लुभाएगी......

ऐसे में उमर फिसलेगी नहीं,
कुछ पल के लिए वहीं थमी रह जाएगी ।

©बन्दना

Wednesday, October 5, 2016

हे घर!



हे घर! अब नहीं मुझे तेरा डर, 
हर समस्या अब तेरा छोड़, तेरे ही हाल पर,  
निकल पड़ी अपनी बनी मकड़ जाल को तोड़ कर, 
जीवन की बहती धारा की दिशा मोड़ कर। 

छूटता है सीमित दायरा दरवाजे से कदम बाहर रखते ही,
मुस्कराता है असीम नीला अम्बर प्रथम स्वागत में ही। 

एक ही छत के नीचे रहते-रहते 
अपने ही कब अजनबी बन जाते हैं,
राहों में चलते अजनबी भी पता नहीं 
प्रेम भरी नजर में अपनों से नजर आते हैं। 

हर पल लगता कुछ छूट गया,
हर पल लगता कुछ नियम टूट गया। 
इस छूटने टूटने के बाद कुछ नूतन होगा,
पीड़ा होगी पर कुछ तो परिवर्तन होगा। 

थोड़ी सेवा, थोड़ा समर्पण
चार हाथों के छत के नीचे,
सूर्यास्त की लालिमा सिन्दूरी लिए 
अस्त होते मन में नया भोर तो जरूर होगा।  

Sunday, March 15, 2015

संजीवनी के चार दिन

एक अनजान सी जगह, गोहाना
संजीवनी में था चार दिन गुजारना। 

रंग-बिरंगे पुष्प, हरियाली थी बिखरी,
पक्षियों की मस्ती, बताती थी वह प्रेम की है बस्ती। 

कहते हैं-- जहाँ कौवे बोलते, वहां मेहमां आते हैं।
जीवन में देखा पहली बार,
सहस्त्र कौवों का कलरव, गान
हर्ष से अभिभूत हो गयी मैं अपार,
विस्मय-विमुग्ध हो गयी,
मुस्करा पड़ी सत्संग हाल में
जब देखा लोगों का सैलाब। 

इसी बीच आ गयी अपनी होली,
अनजाने मित्रों के संग का था अपना रंग,
नयनों को बना पिचकारी,
प्रेम का रंग दे मारी,
आत्मीयता के सूखे गुलाल,
मिटा डाले मन के सारे मलाल,
ललिता जी ने ख्वाबों का खूब खिलाया
टेढ़ी-मेढ़ी, मीठी जलेबियाँ,
रुपिंदर जी ने मधुर स्वभाव से
सबों का जी मीठा कर डाला।  

योग, आसन और ध्यान
आहार पर था कड़ा नियंत्रण,
माता जी के सुरीले भजन-गान,
गुरू जी के अमृत वचन एवं हास-परिहास,
जीवन लगता एक हँसता-गाता खिला गुलाब।  

Saturday, May 10, 2014

माँ की महक


माँ की महक अब नथुनो से नहीं,

स्मृति के तहखानो से आती है। 

क्रीम, पाउडर माथे पर बड़ी सी बिंदिया,
हाथोँ में रंग-बिरंगी कांच की दर्जनो चूड़ियाँ।


अबरख छिड़का कलफ़दार कड़क सूती साडी,
कीमती सड़िों पर पड़ती थी वह भारी।  

निकल पड़ती स्वतंत्र, घर के घेरे से,
हम बहनोँ को नामंजूर होता उसका जाना डेरे से। 

एक बहन रोदन, एक बहन रहती मौन,
समझाती माँ, 'आती हूँ , बस कुछ समय बाद लौट'। 

दूर से देख लेती, आ रही वो,
दोनो बहन दौड़ पड़ती, गेट खोल उसकी ओर। 

दोनोँ हाथोँ में दोनोँ बेटियाँ,
मुस्कराहट की टन-टन बजने लगी तीनोँ के मुख पर घंटियां। 

अब न माँ है जवां, न बेटियाँ बच्ची,
बीती कथा बनकर रह गयी, जो थी कभी सच्ची।   

Thursday, December 19, 2013

चुनौती





शाश्वत सत्य है परिवर्तन, 
चुनौती भरा यह जीवन। 

आज मौसम कुछ है,
कल का कुछ और होगा,
कहीं कली मुस्कायेगी,
कहीं खिला फूल झर जायेगा। 
कभी खड़ी ऊँची फसल,
कभी मिट्टी के अन्तः में छुपा बीज। 

चुनौती है केवल स्वीकारना,
अपने आप को समय के अनुरूप ढालना। 

जो सम्बन्ध था पूर्ण विराम,
बदल बन जाता वह प्रस्नचिन्ह।  
चुनौती है मौन रहना,
जब तक हम समझते, सह रहे,
तबतक समझना बहुत बाकी 
प्रवाह जीवन धारा की जिधर,
चल पड़ेगें हम सब उधर। 
धारा के विपरीत चल नहीं सकते,
 चुनौती है साथ-साथ बहने में। 

कभी उब-डूब, कभी आराम,
जीवन में नहीं कोई विराम। 
आखिरी साँस तक जो मुस्कुराएगा,
वह जीवन चुनौती को मात दे पायेगा।  

Friday, December 6, 2013

मलाला

स्वात से उठी आवाज़
मलाला है हमारी जाबांज।

अशिक्षा के अँधेरे में
दीप बनी, रौशन करने को।

घर कि बेटियाँ अब
बाहर आएँगी, दीप बन
जीवन में प्रकाश फैलाएंगी।

मलाला की दुखद-करुण कहानी का
मन में, रह जायेगा न कोई मलाल। 

Sunday, October 13, 2013

माँ-बेटी संवाद

माँ मेरी, तु मुझे बता 
हर बेटी से होती क्या खता?

माँ होती है सेर,
बेटी होती है सदा सवा सेर. 

रखती हो नज़रों का पहरा,
भरोसा क्या मुझपर नहीं ठहरा।

खुद से भी ज्यादा भरोसा है तुमपर,
मासूम फूल से कहीं भूल से भी भूल न हो जाये-
बस इतना भर. 

जब तुम से दूर जाना पड़ेगा,
सुरक्षा तुम्हारा कहाँ मिल पायेगा?

पक्का हो जायेगा चरित्र तुम्हारा 
इधर उधर के भटकन से खुद ही सिमट जायेगा। 

सिमटकर, बंधकर जीना भी क्या जीना,
खुलकर पंख फैलाकर जीना चाहा मैंने।

आज़ादी होती है सिर्फ विचारों में 
अनुशाशन होती चरित्रों पर सदा. 

बचपन से सींचा है तुमने, 
कदम-कदम पर अंगुली पकड़ थामा। 
अब चलना होगा खुद ही आत्मविश्वास का पहन जामा।

तू चलेगी बिटिया मेरी 
समतल में समान रूप से 
दुर्गम, टेढ़े-मेढ़े, ऊँचे रास्तों पर 
चढ़ाई कर, हौसले से पहुंचेगी चोटी पर.

तुमने अपने जीवन से टपकाया जो प्यार,
नहीं माँ, नहीं जायेगा कभी बेकार।