Thursday, October 1, 2009

बेटी



एक ही सांस से दो जीवन चल रही थी
माँ के अन्दर एक बेटी पल रही थी
कुछ अरमान थे अधूरे, इस ख्वाब से जुड़े
जो मुझ से ना हो सका,
वह यह कर दिखलाएगी
बिटिया से ही पूर्ण हो जाउंगी
उसके लिए हर जोखिम उठाऊंगी

दहेज़ दानव के घर ना जायेगी,
स्वाभिमान से जीवन बिताएगी
दो कुलों की रक्षा करेगी
किन्तु अपनों पर आंच ना आने देगी
प्रेम ही उसका धर्म होगा
सच्चाई ही उसका कर्म होगा

आज नन्ही से परी ने
मेरे जीवन में कदम रखा,
अभी बेटी थी,
लो! माँ बन गयी

ममत्व और करूणा में
मैं भी अंधी हो जाउंगी?
पिछले आ रहे इतिहास को
क्या मैं भी दोहराऊंगी?

नहीं! नव शिशु के साथ
नव चेतना से जागी हूँ
माया में पर कर अपना होश नहीं गवाऊंगी!

यह नम्र, निर्भीक, नरम दिलवाली होगी
ज़रूरत परने पर इस्पात से भी भारी होगी
पहली बार उसे नज़र उठाकर जब देखा
सारी हसरतों को दिल में दबाकर जब देखा
गोब में लेते ही भरपूर हो गयी
अब क्या? उसी में मशगूल हो गयी!

इस कोमल कली की
पूर्ण सम्भावना तक
संभाल कर रखना होगा
मुझे माँ से माली बन जाना होगा!

-- बंदना

3 comments:

  1. आदरनीय मैडम
    आपकी ये कविता "बेटी" मैंने पहले भी पढ़ी थी,,,अच्छी लगी थी...मन को कहीं छू गयी थी..
    आज फिर ये कविता पढ़ी....और आज इसका असली अर्थ समझ पाई
    आपकी इस कविता ने मुझे माँ होने के असली मतलब समझाया और माँ होने की जिम्मे दारी का एहसास भी कराया...
    मुझे माँ से माली बनना है....
    अपनी बिटिया का संस्कार देने हैं ...उसे सही मायनों में अच्छा बनाना है...
    मैं आपकी धन्यवादी हूँ..आपकी कविता मेरे लिए एक लाइट हाउस की तरह है जो जिसने मुझे सिखा दिया के मुझे आपनी बिटिया को क्या सीखना और बनाना है...
    ---मिनाक्षी

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  2. धन्यवाद मिनाक्षी.

    तुम्हारे विचारों को पढ़ कर ऐसा लगा की मेरी कविता लिखने का मकसद सफल हो गया.

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  3. bandu maa yeh kavita padh ke aankh bhar gayi.dil tak pahuchte hain ye shabd.aapki kavitayein padh ke itni khushi hoti hai na ki main aapki beti hoon :)

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