Monday, July 16, 2012

विडम्बना

माँ जो कल थी, वह आज नहीं 
लाडला जो आज है, वह कल ऐसा न था 
फर्क कल और आज का है 
जीते हैं आज में, ढूंढते हैं
बीता, न लौटकर आने वाला कल 

उस घर में

उस घर में सूरज की रौशनी नहीं, 
हर समय व्याप्त है अँधेरा।

कहने को चार कुल दीपक हैं 
जो बाहर जा कर जलते हैं 
घर आते ही बुझ जाते हैं। 

उस घर में है एक पॉवरहॉउस, 
जिसने अपने सारे स्रोत बंद कर रखे।

भेजती थी जिन्हें उर्जा 
अब मांगती हैं उन्हीं से 
वितरित उर्जा का संगठित रूप।   


Thursday, June 7, 2012

वक्त तेजी से बदल रहा

वह स्वयं बदलती जा रही 
खुद को देख नहीं पाती 
सबसे कहती, हर वक्त 
"वक्त तेजी से बदल रहा"

उसने खोया था बचपन और जवानी 
भूल गयी थी वह सब 
रिश्ते बिखरते देखती
आदमी को टूटते देखती
मशीन की शक्ति बढ़ते देखती 
आदमियता घटते देखती 
वह हर वक्त कह उठती 
"वक्त तेजी से बदल रहा " 

Thursday, May 31, 2012

महायात्रा


संसार को संग लिए
करती हूँ कितनी यात्राएँ
सीट हो सुरक्षित 
साज-सामान भर कर
पग-पग पर जागरूक
असुविधाओं से बच कर
निकल पड़ती हूँ दूर कहीं.

पूछते हैं कई लोग
आप अकेले नहीं करती यात्रा?
मुस्करा कर कह देती
करुँगी एक महायात्रा
जिसमें कोई संग न जाएगा
जिसमें कुछ भी साथ न जाएगा
निसंग निकल पडूँगी
कोई आरक्षण नहीं
कोई सवारी नहीं
चोर-लुटेरों का पीछा नहीं
जाने की पूर्व तिथि भी नहीं

छोड़ जाउंगी अपने भारी तन को
मन पंछी बन उड़ जाएगा
एक प्रकाश निकल पड़ेगा
इस मतलबी संसार से
बेमतलबी हो जाएगा
महत्वपूर्ण, महत्वाकांक्षी
न जाने क्या-क्या पाने की
लिप्सा लिए कई जन्म भटकने के बाद
शायद अकेले, उन्मुक्त हो जाउंगी.

Sunday, May 27, 2012

लिखती हूँ किसलिए

लिखती हूँ किसलिए?

बड़ी लेखिका बनने का अरमान 
लेती होँगी अंगड़ाईयाँ 
नहीं, कभी नहीं. 

सोचती होगी 
'जो सोचा, और किसी ने 
शायद सोचा न होगा'
नहीं, कभी नहीं. 

बस उमड़ते घुमड़ते
विचारोँ के बादल 
शब्द बन टपकते, 
मन का आसमाँ 
स्वच्छ साफ हो जाता. 
शायद इसलिए. 

अपने अनुभव को यूँ ही 
गुजर जाने देना नहीं चाहती, 
अनुभव की पतली ही सही 
एक गलियारा बना 
कोई सगा, कोई सखा 
भूले भटके गुजरे इससे, 
जीवन की उन तमाम 
खट्टे मीठे स्वाद का जायका ले,
कहीं आह, कहीं वाह 
हो सके मिल जाये उन्हें 
जीवन की कोई राह. 

शायद इसीलिए लिखती हूँ.   

Wednesday, May 9, 2012

कही अनकही

जीवन की लम्बी राहो पे 
चले हम दोनो साथ साथ 

यह कैसा मुकाम आया 
मेरा साया मुझसे बिछड़ गया 

वह थी उसकी आखरी रात 
कहना था मुझसे कुछ बात 

आने वाले कल ने  मुझे रोक दिया 
मैंने उसे बीच में ही टोकदिया 

दिन भर वह जीवन को निगलती 
रात में बिस्तर पर मेरे समक्ष उगलती 

एक दुसरे से इतनी निकटता बढ़ गयी 
दिनचर्या भी एक दुसरे से पूछकरनिबटती 

पेट में उठता था दर्द असहनीय 
अब जीवन के दर्द  कैसेहो सहनीय 

क्या कहना रह गया ?
इस प्रश्न पर जीवन उलझ गया 

काश! मैं वर्तमान में होता 
रख पता  मर्तवान अपनी खाली 
अंतिम साँस में उसे मुक्त रखता 
अपने अकेले जीवन में 
इस अफसोस का मलवा नहीं ढ़ोता      

Tuesday, April 10, 2012

कलयुग में कृष्ण

कलयुग में कृष्ण पधारे
  देखा, घर-घर मैं है महाभारत छिड़ा
अन्याय की युद्ध अन्याय से ही चल रही
विवेक और धैर्य का तो नाम ही मिटा

कृष्ण भी पड़ गए द्वन्द में
उनकी नीति भी डगमगाई
अन्याय पर न्याय की विजय करवाने को
वह छल भी करने को राज़ी
किन्तु अन्याय पर अन्याय में
किसकी विजय हो भारी?
दोनों पक्ष लड़ते मरते रहेंगे
कृष्ण खड़े, साक्षी भाव से देखते रहेंगे

वह खड़े हैं संसार के कुरुक्षेत्र में,
उनकी दृष्टि थी अर्जुन को ही ढूंढ़ रही
          कहीं कोई अर्जुन नज़र नहीं आता
 हर तरफ दुर्योधन ही था खड़ा

हाय! मैंने क्यूँ सुन्दर संसार बनाया?
माया इंसानों में डालकर
इस हरी-भरी धरती को शमशान बनाया
अब हर घर में एक अर्जुन पैदा करना होगा
उसके द्वारा ही माया के महाभारत को जीतना होगा.

                                                                 -बंदना