Thursday, October 7, 2010

मेरी कविता


जीवन की चक्की में,
गोल-गोल घुमती,
अपनी आयु से निकले
एक-एक दिन
एक-एक दाने
पीसते-पीसते अनुभव के आंटे,
करूणा के शीतल जल से गुंथे,
प्रेम से उसको आकार  दिया
उर्जा की अग्नि में पकाया,
फिर पक्की-कच्ची गोल-गोल रोटी
बनकर आई मेरी कविता

जीवन में कड़वे-मीठे अनुभव
आते और यूँ ही चले जाते,
जैसी पकड़ चीज़ों की
उतना सुख-दुःख का एहसास,
इसी में उलझी
इससे ही निकली,
कभी बंधन में जकड़ी
कभी उन्मुक्त हल्की,
 सारे अनुभवों को
कपड़ों की तरह ढकती 
आई मेरी कविता

जीवन की ज़मीन पर
जिसने जन्म लिया
वह कहीं ना कहीं
अवश्य है खड़ा.
सड़क का फुटपाथ
या झुग्गी झोपड़ी 
अमीरों के महल
या मध्यम  वर्ग का मकान,
वास व आवास के इन एहसासों से बनती
आई मेरी कविता




Sunday, August 15, 2010

चैतन्य प्रेम

निशा गई, उषा आई,
नींद गयी, जागरण आया,
नयन खुले, दर्शन आया,
प्रेम के  द्वार खुले
नफरत दबे पाँव भागा.

घर से ज्यों ही बाहर कदम रखा,
हवा ने भरपूर सांस दी,
उसे अन्दर रोका, वह तरफरा उठी.
खेलते मासूम शिशु को यूँ ही पकड़,
जबरदस्ती गोद में उठाने पर जैसे,
छोड़ दिया, मुक्त किया.
आगे बढ़ी, हरे-भरे पेड़-पौधों को देखा,
प्रेम से देखा, हरियाली नेत्रों को सुकून दी,
सूखे गिरे पत्ते भी मानो विदा मांग रहे.
पक्षी कुछ-कुछ गा रहे थे,
वह रोज़ गाते थे, किन्तु
हमारा मन रोज़ नहीं रस ले पाता था.
वह अपना ही राग आलापता था.
प्रेम ने उसके राग-द्वेषों को मिटाया,
आज खाली मन उन्मुक्त पक्षियों,
के संग-संग गीत गाया.

इंसान प्रेम को ही भूलता जा रहा है,
मशीन के साथ संग बढाता जा रहा है,
क्या वह परस्पर भाव को समझ पायगी,
वह तो वही दे सकती, जो उसमें गया है भरा,
प्रेम की तरह नई सृजन नहीं कर सकती.

मानव को मानव से ही प्रेम बढ़ाना होगा,
मानव न मिल पाए तो किसी चेतन शक्ति से,
जुड़ जाना होगा,
प्रकृति और प्रभु किसके पास नहीं होते?
इनसे प्रेम न बढाया जाए तो यह,
चन्द्रमा की तरह घटना शुरू हो जाता,
घटते-घटते ही मनुष्य दानव बन जाता

युद्ध, आतंक और अशांति को यह जग में फैलाता है,
भय को लिए व्यक्ति यूँ ही तड़फड़ाता है,
उनसे बचना हो तो हमें प्रेम बढ़ाना होगा,
एक-दुसरे के लिए जी कर आनंद बढ़ाना होगा.

-बंदना
 Reply

माँ





माँ! तू प्रेम की मूरत,
भली लगती तेरी सूरत.
ज्ञान की प्रथम मशाल हो,
ईश्वर का दिया तोफ़ा बेमिसाल हो.
करूणा बन बहती हो जीवन में,
जीवन के कर्म युद्ध में तुम,
बनती हमारी ढाल हो.
बदहाल एवं बेबस बच्चे को,
तेरी आँचल से मिलती छाँव है.
भूले भटके को राह दिखलाती
क्षमा करना तुम्हारा श्रृंगार है.
नास्तिक का भी मस्तक,
तेरे आगे झुकता है,



तुम अद्भुत! अनूठी उपहार हो.

तुम्हारे पेट के निकट जब,
लेट जाते, जन्नत की खुशियाँ,
इर्द-गिर्द लोटने लगती है.
समय की चाल का पता नहीं चलता
ज्यों धरती माँ घूमती रहती है,
हमें आभास भी नहीं होता.
शब्द तुम्हारे अपशब्द हो सकते,
पर भाव सदा भला ही होगा.
दर्द घोलते माँ के जीवन में,
वह कितना बेदर्दी होगा.
खुद घुट-घुटकर भी घोटती
'जीवन घूंटी' औलादों के लिए.

-बंदना

Wednesday, December 23, 2009

27/11


दो दशक बाद दस्तक,
दी पुरानी यादों ने,
जीवन में जब यह दिन आया था,
नव चेतना ने बदल दिया था,
तन-मन के पुराने रंग को,
शरीर पीड़ा के अंतिम सीमा पर,
मन मातृत्व की ऊँचाई पर ठहरा,
जीता-जागता प्राणों से भरपूर,
एक अनूठे खिलौने से,
भर दिया था गोद उसके,
गोल-गोल गुलाबी गालों ने,
गुदगुदाया था कितना मेरे मन को?
फुले-फुले, मुरे-मुरे हाथ-पैर,
खाली-खाली नयन, संसार से अनजान,
बड़ा सा सिर, बालों से भरा,
कानों पर झूलते कोमल लटें,
थोथे, बिन दाँतों के मसूड़े,
रोते वक्त दिखाई देते,
वह सारे रिश्तों से बिल्कुल अनभिज्ञ था,
हम सारे उससे कोई न कोई नाते जोड़ रखे थे
जब पहली बार उसे गोद उठाया,
कोमल स्पर्श ने हमें और सुकोमल बनाया,
बचपन से न जाने कितने बच्चे गोद उठाये,
पर इस अहसास में माँ होने का रसायन मिला था,
अपने शरीर से एक और प्राण का आगमन,
माँ! दुनिया में लाने का एक द्वार

लाना ही काफी नहीं होता,
वर्षों-वर्ष करने पड़ते हैं पोषण,
तब जाकर यह चिराग होते हैं रौशन!
समय आगे बढ़ता है निरंतर,
परिवर्तन से दिखाई देता है अंतर,
अभी जो बालक था देखते ही देखते,
बीस साल का युवा बन खड़ा है

कल तक आगे-पीछे डोलता फिरता था,
आज मीलों दूर हमसे पड़ा है
अपने ममता के आँचल की छांव से
धूप न पड़ने देती थी कभी,
आज जीवन के सारे संघर्षों को
खुद अकेले झेले जा रहा है
एक -एक वर्ष करते वह हमसे दूर
होता जा रहा है,
माया के भ्रम में जोड़ते जाते हैं,
यूँ ही हम साल वर्ष.

--बंदना

Monday, October 5, 2009

अगरबत्ती

अगरबत्ती को आज जलते देखा
पल-पल वह जलती, राख होती जा रही थी
साथ-साथ खुशबू धुएं में उड़ा रही थी
एक तिनके पर चढाये गए थे मसाले,
मसाले के जलने तक थी उसकी आयु,
जब तक जली, महक उठा कमरा,
बुझी तो राख एवं छोटा सा तिनका बचा

जब-जब मैं भी जली,
तब-तब अहम् को लिए मिटी,
अब भी ना जाने कितने मसाले,
चिपके हैं मन पर
हौले-हौले जलेंगे सारे
हल्के-हल्के राख बन उड़ेंगे सारे

जीवन रहते चाहे मसाले भर लो जितनी,
हम इंसान की कीमत है बस इतनी।

--बंदना

Thursday, October 1, 2009

चाहत

बस एक चाह थी
कोई एक राह मिल जाए
जिस पर चल कर
हर चाह मिट जाए

हर बात की शुरुआत
एक चाह से होती है
यहाँ चाह से मुक्त होने में भी तो
एक चाह पैदा हो गयी

ये चाहत के सिलसिले
समाप्त ही नहीं होते
मुंह मोड़ लो तो कुछ लम्हे
ठहर भी जाये
पुनः आने को आतुर रहते

शायद जीवन का मतलब ही
कुछ पाने की चाह के केंद्र में टिका है
उसी केंद्र पर प्रभु भी बैठा है
चाहत मिटी वह प्रकट हो जाता है
चाह को जगाना ही
उसे छुपाना है

इसी लुका छिपी, राग वैराग्य में
जीवन के खेल खेलती हूँ
कभी गम के बादलों में छुपती
तो कभी खिलखिलाती धूप में
प्रकट हो जाती हूँ

                 @बंदना

बेटी




एक ही सांस से दो जीवन चल रही थी
माँ के अन्दर एक बेटी पल रही थी
कुछ अरमान थे अधूरे, इस ख्वाब से जुड़े
जो मुझ से ना हो सका,
वह यह कर दिखलाएगी
बिटिया से ही पूर्ण हो जाउंगी
उसके लिए हर जोखिम उठाऊंगी

दहेज़ दानव के घर ना जायेगी,
स्वाभिमान से जीवन बिताएगी
दो कुलों की रक्षा करेगी
किन्तु अपनों पर आंच ना आने देगी
प्रेम ही उसका धर्म होगा
सच्चाई ही उसका कर्म होगा

आज नन्ही से परी ने
मेरे जीवन में कदम रखा,
अभी बेटी थी,
लो! माँ बन गयी

ममत्व और करूणा में
मैं भी अंधी हो जाउंगी?
पिछले आ रहे इतिहास को
क्या मैं भी दोहराऊंगी?

नहीं! नव शिशु के साथ
नव चेतना से जागी हूँ
माया में पर कर अपना होश नहीं गवाऊंगी!

यह नम्र, निर्भीक, नरम दिलवाली होगी
ज़रूरत परने पर इस्पात से भी भारी होगी
पहली बार उसे नज़र उठाकर जब देखा
सारी हसरतों को दिल में दबाकर जब देखा
गोब में लेते ही भरपूर हो गयी
अब क्या? उसी में मशगूल हो गयी!

इस कोमल कली की
पूर्ण सम्भावना तक
संभाल कर रखना होगा
मुझे माँ से माली बन जाना होगा!

-- बंदना