Sunday, May 27, 2012

लिखती हूँ किसलिए

लिखती हूँ किसलिए?

बड़ी लेखिका बनने का अरमान 
लेती होँगी अंगड़ाईयाँ 
नहीं, कभी नहीं. 

सोचती होगी 
'जो सोचा, और किसी ने 
शायद सोचा न होगा'
नहीं, कभी नहीं. 

बस उमड़ते घुमड़ते
विचारोँ के बादल 
शब्द बन टपकते, 
मन का आसमाँ 
स्वच्छ साफ हो जाता. 
शायद इसलिए. 

अपने अनुभव को यूँ ही 
गुजर जाने देना नहीं चाहती, 
अनुभव की पतली ही सही 
एक गलियारा बना 
कोई सगा, कोई सखा 
भूले भटके गुजरे इससे, 
जीवन की उन तमाम 
खट्टे मीठे स्वाद का जायका ले,
कहीं आह, कहीं वाह 
हो सके मिल जाये उन्हें 
जीवन की कोई राह. 

शायद इसीलिए लिखती हूँ.   

Wednesday, May 9, 2012

कही अनकही

जीवन की लम्बी राहो पे 
चले हम दोनो साथ साथ 

यह कैसा मुकाम आया 
मेरा साया मुझसे बिछड़ गया 

वह थी उसकी आखरी रात 
कहना था मुझसे कुछ बात 

आने वाले कल ने  मुझे रोक दिया 
मैंने उसे बीच में ही टोकदिया 

दिन भर वह जीवन को निगलती 
रात में बिस्तर पर मेरे समक्ष उगलती 

एक दुसरे से इतनी निकटता बढ़ गयी 
दिनचर्या भी एक दुसरे से पूछकरनिबटती 

पेट में उठता था दर्द असहनीय 
अब जीवन के दर्द  कैसेहो सहनीय 

क्या कहना रह गया ?
इस प्रश्न पर जीवन उलझ गया 

काश! मैं वर्तमान में होता 
रख पता  मर्तवान अपनी खाली 
अंतिम साँस में उसे मुक्त रखता 
अपने अकेले जीवन में 
इस अफसोस का मलवा नहीं ढ़ोता      

Tuesday, April 10, 2012

कलयुग में कृष्ण

कलयुग में कृष्ण पधारे
  देखा, घर-घर मैं है महाभारत छिड़ा
अन्याय की युद्ध अन्याय से ही चल रही
विवेक और धैर्य का तो नाम ही मिटा

कृष्ण भी पड़ गए द्वन्द में
उनकी नीति भी डगमगाई
अन्याय पर न्याय की विजय करवाने को
वह छल भी करने को राज़ी
किन्तु अन्याय पर अन्याय में
किसकी विजय हो भारी?
दोनों पक्ष लड़ते मरते रहेंगे
कृष्ण खड़े, साक्षी भाव से देखते रहेंगे

वह खड़े हैं संसार के कुरुक्षेत्र में,
उनकी दृष्टि थी अर्जुन को ही ढूंढ़ रही
          कहीं कोई अर्जुन नज़र नहीं आता
 हर तरफ दुर्योधन ही था खड़ा

हाय! मैंने क्यूँ सुन्दर संसार बनाया?
माया इंसानों में डालकर
इस हरी-भरी धरती को शमशान बनाया
अब हर घर में एक अर्जुन पैदा करना होगा
उसके द्वारा ही माया के महाभारत को जीतना होगा.

                                                                 -बंदना   

Saturday, March 24, 2012

जीवन में आँखमिचोली

जीवन में रह कर कभी
जीवन से छिप जाना दोस्तों
बेहोश ज़िन्दगी से कभी
दो पल ही सही
होश में आना दोस्तों

भीड़ में चलते-चलते कभी
यूँ हीं राह भटक जाना दोस्तों
जिसे मंजिल समझ चले थे
तय होने पर मुकाम साबित हुआ
कभी एक मुकाम को ही सही
मंजिल समझ ठहर जाना दोस्तों

दो पल की दोस्ती ही सही
जीवन छूट जाने पर भी
हर दोस्तो के दिल पे
दोस्ती के निशान छोड़ जाना दोस्तों


                                                           ~बंदना

वह एक श्वेत फूल

अनगिनत फूलो के बीच
वह एक श्वेत फूल
उग आया था भूल से
 किन्तु बड़ा अनोखा

बाकी सारे फूल
सूरज की ऊष्मा में खिलते
शाम में बंद हो उदासी बिखेरते

पर वह एक श्वेत फूल 
खिला अपने दम पर
और अपनी पूर्ण आयु तक 

बाकी सारे फूल ख़ूबसूरत
और रंगबिरंगे थे
यह रंग विहीन हो कर भी
अपनी स्वतंत्रता में सबसे
मोहक और सुंदर .
                                            ~बंदना

बदलती तस्वीर

कितने आईने बदले
पर तस्वीर बदलती न थी
एक नजरिया जो बदला
तो सारी तस्वीर बदलती नज़र आई

लेने की चाह ने  बहुत भटकाया
लालच प्यार के दो बातोँ की ही सही
ऐसे में हर रिश्ते खोटे नज़र आये
देने लगी जब प्यार की अपनी नज़र
अपनी की तो बात ही क्या
कहा जाता था जिसे गैर
वह भी अपनो से बढ़ कर नज़र आये.

भीड़ में रहने पर
भूले रहने का भय
तन्हाई मिली तो खोने का ही रोना
अब तो भीड़ में भरने की ख़ुशी
तन्हाई में खुद से मिलने का जशन
खाली होने पर जो मिला
सब में उनकी रहमत ही नज़र आई.
                                                        ~बंदना

कुछ अधूरे ख्वाब

ऊर्जा और उल्लास के ताने बाने से
खूबसूरत कई ख्वाब बुने
कुछ पूरे हुए
कुछ रहे अधूरे

यथार्थ की ज़मीं पर
बिछे पूरे हुए ख्व़ाब
अधूरे ख्व़ाब में
कुछ रंग भरने है बाकी
वह बिछ जाएगा
खुले आसमान में
दूर, बहुत दूर तलक

                                ~बंदना